शनिवार, 21 नवंबर 2009

दो लफ्ज

दो लफ्ज ही काफ़ी थे
देने को तसल्ली यार
तुम्हे वक्त न मिला, हमें अल्फाज ना मिले।

कुछ घोर घने जंगल
कुछ घोर घनी आँधी

हमने कहाँ आजमाया,
कुदरत की आजमाइश थी ,

अब तुम हारे या हम हारे,
हारना हमारी किस्मत थी,
हम प्यार के जज्बे क्या जाने,
व्यापार हमारी फितरत थी।

सोमवार, 26 अक्टूबर 2009

बह जाने दो

तेरी खामोश आवाज सुनने की कोशिश करता रहा .
प्रयत्न से
सुनना साँसों को.
और थाह लेना भारी मन की.
गहरी ठंडी साँसों से पहुचना.
ह्रदय के उस कोने तक.
जहाँ दर्द सिमटा हुआ हैं.
शायद बहना चाहता हैं .
तरल बनकर आँखों से .
बह जाने दो .
रोको मत .
वो अपना नहीं हैं .
जाया मत करो अपना प्रयत्न .
उसको समेटने में जो चुभता हैं.
मन को हल्का करना सार्थकता हैं .
खोने का गम कुछ पाने की ख़ुशी से,
कम तो नहीं होता पर ,
आँखे बंद रखो तो अँधेरा होता हैं ,
दिन और रात से बे परवाह,
सामने सबेरा तुम्हे पुकार रहा हैं ,
नयी सुबह, नयी राह, नयी मंजिल ,
बस जरूरत हैं आँखें खोलने की,
जरूरत हैं पार पाने की व्यथा से ,
मुझे भी पता हैं आसान नहीं हैं ,
आसान तो ये भी नहीं हैं,
तिल तिल जलना